Thursday, May 23, 2019

प्रणब मुखर्जी अचानक क्यों सक्रिय हो गए हैं?: नज़रिया

प्रणब मुखर्जी एक व्यक्ति हैं. सिद्धांतवादी आज के दौर में वो शायसर्वाद धिक सम्मानित भारतीयों में से एक हैं.
इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) को लेकर लगाए गए आरोपों या फिर वोटिंग मशीन में टेम्परिंग (धांधली) को लेकर उनकी चिंता, जिसे उन्होंने वोटरों की टेम्परिंग कहा है, गंभीर है. इसके राजनीतिक मायने भी हैं.
ये पूरा घटनाक्रम और प्रणब मुखर्जी के बयान की टाइमिंग इस पूरे मुद्दे के और भी अर्थ निकालने की वजह बनती है. इसमें कई संभावनाएं भी तलाशी जा रही हैं.
प्रणब मुखर्जी ने सोमवार को एनडीटीवी की सोनिया सिंह की एक किताब रिलीज़ करते हुए कहा, "संस्थान उम्दा हैं और ये संस्थान कई बरसों में तैयार हुए हैं. मैं मानता हूं कि सिर्फ एक खराब कारीगर ही अपने औज़ारों से शिकायत करता है. एक अच्छा कारीगर जानता है कि इन औज़ारों का इस्तेमाल कैसे किया जाए."
मौजूदा वक़्त में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भारी बहुमत से जीत का अनुमान ज़ाहिर करने वाले तमाम एक्ज़िट पोल के बोझ तले दिल्ली के राजनीतिक हलके ने प्रणब मुखर्जी के बयान को उस चुनाव आयोग की तारीफ के तौर पर देखा जिस पर विपक्षी दल पक्षपाती होने की तोहमत लगाते हुए हमला कर रहे हैं.
प्रणब मुखर्जी शब्दों की सही नाप तोल के लिए जाने जाते हैं और आम तौर पर बयानों को पलटने, खंडन करने या फिर स्पष्टीकरण देने से दूर रहते हैं. लेकिन उन्होंने ही 24 घंटे के ही अंदर चार पैराग्राफ का बयान जारी किया. इसके हर शब्द के राजनीतिक मायने हैं.
इस बयान में उन्होंने कहा, "संस्थान की सत्यनिष्ठा तय करने की ज़िम्मेदारी" चुनाव आयोग पर है. "ईवीएम चुनाव आयोग के अधिकार में हैं और उनकी सुरक्षा आयोग की जिम्मेदारी है."
कामगार के अपने औज़ारों में ख़ामी तलाशने की बात करने वाले प्रणब मुखर्जी ने मानो अपनी कही बात की समीक्षा करते हुए कहा, "अपने संस्थानों में आस्था रखने वाले व्यक्ति के तौर पर मेरी ये राय है कि ये 'कामगार' है जो तय करता है कि संस्थान के 'औज़ार' कैसे काम करें."
पूर्व राष्ट्रपति ने कहा, "हमारे लोकतंत्र की बुनियाद को चुनौती देने वाली अटकलों के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए. जनमत के पाक साफ होने में रत्तीभर संशय की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए." ये एक ऐसा रुख है जिस पर कोई भी लोकतंत्रवादी आपत्ति नहीं करेगा.
बड़ा सवाल ये है कि प्रणब मुखर्जी की मंशा क्या है? क्या वो उस चुनाव आयोग का समर्थन करते नहीं दिखना चाहते हैं, जिस पर विपक्ष हमलावर है?
इससे भी अहम ये है कि प्रणब मुखर्जी का बयान ऐसे वक़्त में आया है जबकि बीजेपी और पूरा एनडीए चुनाव आयोग पर सवाल उठाने के लिए विपक्ष की खिल्ली उड़ाने में जुटा है और इसे उनकी चुनाव में हार के संकेत के तौर पर देख रहा है.
दलगत आस्था से दूर एक पूर्व राष्ट्रपति जो फिलहाल उम्दा स्वास्थ्य होने के बाद भी रिटायर्ड जीवन बिता रहे हैं, लोकसभा चुनाव के परिणाम आने के एक दिन पहले सक्रिय क्यों हो जाते हैं?
दिल्ली के राजनेताओं का एक धड़ा ऐसा भी है जो अब भी मानता है कि 17वीं लोकसभा चुनाव के नतीजों में किसी को भी स्पष्ट बहुमत नहीं मिलेगा. सत्ताधारी गठबंधन या फिर विपक्ष दोनों के ही लिए सरकार बनाना मुश्किल होगा. पर्दे के पीछे की इस बातचीत में एक ऐसे व्यक्ति की तलाश है जिसकी क्षेत्रीय दलों के बीच व्यापक तौर पर स्वीकार्यता हो.
ख़ासकर कांग्रेस और एनडीए के बाहर के दल, मसलन बीजू जनता दल, वाईएसआर कांग्रेस और तेलंगाना राष्ट्रीय समिति जैसे कुछ और दल.
आज़ादी के बाद के भारतीय इतिहास के 15 राष्ट्रपतियों (वास्तविकता में 13 क्योंकि ज़ाकिर हुसैन और फ़ख़रुद्दीन अली अहमद की पद पर रहते हुए ही मौत हो गई) में से किसी ने सक्रिय राजनीति में वापसी नहीं की. ज़ैल सिंह राजीव गांधी का विरोध करने के विचार को टटोलते रहे. वहीं आर वेंकटरमण 'राष्ट्रीय सरकार' की अगुवाई करने की आकांक्षा को गुपचुप पालते रहे.
आरवी के नाम से मशहूर वेंकटरमण भारत के आठवें राष्ट्रपति थे. उनका कार्यकाल 1987 से 1992 तक था. ये वो दौर था जब मतदाताओं ने 1989 और 1991 में खंडित जनादेश दिया और देश ने अनचाहे तरीके से गठबंधन सरकार को मंजूर किया.
खंडित जनादेश के दौर में वेंकटरमण राष्ट्रीय सरकार के विचार को आगे बढ़ाने की कोशिश में थे.
साल 1989 में वीपी सिंह ने गठबंधन सरकार की अगुवाई की. उन्हें दक्षिणपंथी और वाम दलों दोनों का समर्थन मिला. लेकिन उन्होंने 'राष्ट्रीय सरकार' का विकल्प नहीं चुना.
साल 1991 में पीवी नरसिंह राव ने अल्पमत की सरकार चलाने के लिए वाम दलों का समर्थन हासिल किया. दोनों ही मौकों पर प्रणब मुखर्जी ने पूरे घटनाक्रम को करीब से देखा.
प्रणब मुखर्जी के करीबी सूत्रों का कहना है कि पूर्व राष्ट्रपति न तो बहुत महत्वाकांक्षी हैं और न ही देश की राजनीतिक स्थिति से अनजान हैं. एक घाघ राजनीतिज्ञ की तरह प्रणब मुखर्जी रिंग में अपना हैट तब तक नहीं फेंकेंगे जब तक कि 17वीं लोकसभा एक्ज़िट पोल के अनुमानों के परे बुरी तरह खंडित जनादेश नहीं देती और पूरा विपक्ष हाथ जोड़े उनका दरवाजा नहीं खटखटाता है.
प्रणब मुखर्जी को ये भी अंदाज़ा है कि एक उलझे गठबंधन को चलाना मुसीबत को आमंत्रित करने की तरह है. लेकिन कुछ लोगों की राय है कि प्रधानमंत्री कार्यालय प्रणब मुखर्जी के योग्य है. वो देश के वित्त, विदेश और रक्षा मंत्री रह चुके हैं. उनके बारे में ये टैगलाइन भी मशहूर है, "सर्वश्रेष्ठ प्रधानमंत्रियों में से एक जो भारत को कभी नहीं मिला."
क्या ये सिर्फ खाली दिमाग की अटकलें हैं? इस सवाल का जवाब 2019 चुनाव के नतीजे आने के बाद ही मिलेगा.
प्रणब मुखर्जी विवादों को आमंत्रित करने या फिर चौंकाने से पीछे नहीं रहते. भूलना नहीं चाहिए कि जून 2018 में उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नागपुर स्थित मुख्यालय में मुख्य अतिथि बनना मंजूर किया था.

Friday, April 19, 2019

بالصور: كشف أثري جديد عمره 2000 عام جنوبي مصر

أعلنت السلطات في مصر العثور على مجموعة من الجرذان وحيوانات أخرى واثنتين من المومياوات يعتقد أن عمرها يتجاوز أكثر من 2000 عام.
وقد وجد على جدران مقبرة في مدينة سوهاج، جنوبي مصر، رسومات توضح مراحل عملية الدفن ورسومات أخرى لمزارعين يعملون في الحقول.
ويعتقد أن هذه المقبرة كانت استراحة لمسؤول كبير بالدولة المصرية القديمة يُدعى "توتو" وزوجته.
واكتشفت المقبرة في أكتوبر/تشرين الأول عن طريق مهربين ألقي القبض عليهم وهم يحفرون بشكل غير قانوني للبحث عن أثار.
وتأمل وزارة الأثار المصرية أن يجذب هذا الكشف أنظار السياح إلى محافظة سوهاج الواقعة على بعد 390 كيلومترا جنوب القاهرة.
ويعتقد أن المومياوين لامرأة كان يتراوح عمرها بين 35 و 50 عاما، وطفل كان يبلغ من العمر 12 و 14 عاما.
كما عثر على عشرات المومياوات الأخرى التي تعود لفئران وقطط وطيور.
وتقول وزارة الآثار إن الهدف من عرض هذه المقبرة المكتشفة حديثا هو جذب مزيد من الانتباه لحضارة و آثار مصر.
تتعدد الأعراق والأديان والطوائف والتوجهات السياسية في المجتمعات العربية، وتتباين مواقف مواطني هذه المجتمعات، كما هو الحال في الكثير من المجتمعات في مناطق أخرى من العالم، تجاه مجموعة واسعة من القضايا السياسية والدينية والاجتماعية، ومن بينها المواقف من العلاقات والاختيارات الجنسية للأفراد، بما في ذلك المواقف من الجنسية المثلية والمتحولين جنسيا.
وسواء بالنسبة لمن يرفض العلاقات المثلية تماما، ويتحفظ كثيرا على المتحولين جنسيا، أو من يقبل، بدرجات متفاوتة المثليين والمتحولين جنسيا، تظل الحقيقة أن هذه الفئات موجودة في المجتمعات العربية، وأنه لابد من وجود تشريعات للتعامل مع هذه التوجهات، سواء بالرفض أو القبول، وطريقة لتعامل المجتمعات معهم.
وعن التشريعات التي تتعامل مع هذه التوجهات، تقول نيفين معرفي، المحامية أمام محكمة التمييز والدستورية في الكويت، إن الحفاظ على الكرامة الإنسانية هو هدف أساسي للدساتير والقوانين، وبالتالي من غير المقبول تعرض أي فرد للاعتداء أو الإيذاء أو العنصرية بسبب مواقفه وآراءه، ولكن في ذات الوقت لا يمكن أن تقبل الدول التي تستند تشريعات الاحوال الشخصية فيها الى الشريعة الاسلامية، ومن بينها أغلب الدول العربية، فكرة الزواج بين المثليين، أو الإعتراف بحقوق المثليين، لأن هذا يتنافى تماما مع الشريعة الإسلامية. وتضيف معرفي "أي علاقة داخل الأبواب المغلقة لا علاقة لا أحد بها، ولكن الخروج بهذه العلاقة إلى العلن يعني أنها ستكون تحت طائلة القانون. وهذا ينطبق على العلاقات المثلية. لا علاقة لا أحد بها إذا كانت غير معلنة، ولكن الاعتراف بها علنا يعني مواجهة التشريعات والقوانين التي ترفضها، ومواجهة التقاليد التي تدينها، خاصة في مجتمعات محافظة مثل المجتمعات الخليجية".
غير أن داليا الفغال، الناشطة الحقوقية، والتي سبق أن أعلنت صراحة على صفحاتها على مواقع التواصل الاجتماعي أنها مثلية الجنس، تنظر للأمر بشكل مختلف، وترى أن حريتها في إقامة علاقة مع امرأة أخرى لا تضر المجتمع في شيء ولا تلحق الضرر بالآخرين. ومن ثم، ترى داليا أن المطالبة بأن تظل العلاقات المثلية داخل الابواب المغلقة تمثل ظلما لها من جانب، ولا توفر لها الحماية ممن يرفضونها ويعتدون عليها لفظيا، ويهددونها بالاعتداء الجسدي من جانب آخر. وتضيف داليا، التي تعيش حاليا في أوروبا، أنها لا تستطيع العودة إلى مصر بسبب خوفها من التعرض للاعتداء بكافة أشكاله، وبالتالي تبقى المعضلة، من وجهة نظرها، أن المجتمع يعاقبها ويظلمها لأن اختياراتها الشخصية مختلفة.
وفي ذات السياق يضيف طارق زيدان، مدير مؤسسة "حلم" في لبنان للدفاع عن حقوق المهمشين، أن العلاقات الجنسية غير النمطية، مثل الميول الجنسية تجاه شخص من ذات النوع، موجودة منذ أن بدأت البشرية، وموجودة في كل المجتمعات العربية، شئنا أم أبينا، ويمثل الأفراد الذين لديهم هذه الميول جزء من نسيج المجتمعات العربية بكافة تنوعاتها العرقية والطائفية، وليسوا دخلاء على هذه المجتمعات، وبالتالي تعرضهم للظلم والايذاء والعنصرية والقمع والاعتقال التعسفي أحيانا هو أمر مرفوض تماما ويجب وقفه بكل الطرق. ويرفض طارق استخدام كلمة "شذوذ" لوصف العلاقات المثلية، ويرى أن الوصف الصحيح هو أنها علاقات غير نمطية.

Wednesday, March 20, 2019

مظاهرة مناهضة لإيران في الولايات المتحدة

وظهر في الفيديو أحد أعضاء التنظيم ويدعى أبو عبد العظيم، وقال: "غدا، إن شاء الله، سنكون في الجنة وسيحترقون هم في الجحيم".
وتم نقل معظم الأشخاص الذين تم إجلاؤهم من أراضي التنظيم إلى مخيم في الهول، شمال شرقي سوريا، ووصفت الأمم المتحدة الظروف بأنها مزرية.
ويؤوي المخيم، المصمم لاستيعاب 20 ألف شخص، أكثر من 66 ألف شخص.
وقالت منظمة الصحة العالمية يوم الثلاثاء، إن 106 أشخاص، معظمهم من الأطفال، لقوا حتفهم منذ ديسمبر/كانون الأول في الرحلة إلى مخيم الهول، التي تستغرق ست ساعات على الأقل.
ولا يزال العديد من الأشخاص الذين تم إجلاؤهم، وخاصة المقاتلين الأجانب، يعبرون عن دعمهم الشديد للدولة الإسلامية، مما يشكل قضايا أمنية وقانونية وأخلاقية صعبة بالنسبة لبلدانهم الأصلية.
وزاد الجدل حول تلك القضايا بعد الإعلان عن وفاة رضيع شميمة بيغوم الفتاة البريطانية التي فرت من لندن وانضمت للتنظيم في سوريا، وأعلنت الحكومة البريطانية تجريد الفتاة من جنسيتها لأسباب أمنية الشهر الماضي.
على الضفة الغربية لنهر دجلة الذي يشق العاصمة العراقية بغداد، في المنطقة الخضراء، تمتد مباني السفارة الأميركية في العراق كأكبر سفارة لها في الشرق الأوسط. وفي المقابل تماما على الضفة الشرقية، لا تغيب صور المرشد الإيراني آية الله علي خامنئي وسلفه آية الله خميني وهي تعلو لوحات تمجّد مقاتلين لفصائل الحشد الشعبي ممن سقطوا في القتال ضد تنظيم "الدولة الإسلامية".
يشرح المشهد بمجمله واقع تقاسم النفوذ الإيراني الأمريكي في عراق ما بعد صدام حسين، وانعكاس هذا التزاحم على حال البلاد التي تبدو أقرب إلى رقعة شطرنج كبرى تتحرك عليها القطع المتعددة.
لكن القضية ليست مجرد مبانٍ وصور، بل مصير بلد يعيش ازدواجية تتكرس يوما بعد يوم في أدائه السياسي وتعاملاته الاقتصادية والتزاماته تجاه محيطه الإقليمي.
منذ سقوط نظام حزب البعث العراقي إبان الغزو الأميركي للعراق عام 2003، كان الظن أن واشنطن في طريقها لصناعة مستقر لها طويل الأمد في العراق. وكان الاعتقاد السائد أن خطوات واشنطن باتجاه ترويض خصومها الإقليميين ستنطلق من العراق الذي سيتحول إلى قاعدة أساسية لصناعة واقع جديد في المنطقة.
على رأس الخصوم الإقليميين هؤلاء كانت طهران التي لم تكن بعد قد أكملت رسم خريطة تأثيرها على صورتها التي هي عليها اليوم.
البعض يذهب أبعد من ذلك للقول إنه لو لم تغز الولايات المتحدة العراق لما كان نفوذ "دولة الولي الفقيه" في المنطقة على ما هو عليه الآن، ولما كانت هي في قلب معادلة التجاذب هذه.
اختيار عبارة "دولة الولي الفقيه" لم يأت جزافا أعلاه، فهو تمييز مقصود بين حكومة الدولة في إيران ودولة الإيديولوجيا التي لا تحدها خريطة جغرافية واضحة، والأخيرة هي التي تصنع لحكومة الدولة الإيرانية حضورها.
هكذا يمكن تشريح العلاقة المتداخلة بين إيران وحلفائها في المنطقة عامة وفي العراق خاصة، وتحديدا الذين يُعتبرون امتدادا عضويا للنظرية.
جماعات ككتائب حزب الله والنجباء وعصائب أهل الحق وغيرها بُنيت من داخل النسيج العراقي، وهي قد تختلف في ما بينها على المكاسب والمصالح، لكنها تلتزم بما يقوله "القائد" كما يصفون المرشد الإيراني آية الله علي خامنئي، أو قائد قوة القدس اللواء قاسم سليماني، دون أن يهمهم مثلا ما قد يقوله الرئيس الإيراني أو أي مسؤول آخر في حكومته.
مع ذلك فإن هذه المنظومة تنعكس في نهاية المطاف على مصالح إيران الدولة بشكل مباشر أو غير مباشر كما هو الحال اليوم في ظل تصاعد التوتر مع الولايات المتحدة على خلفية العقوبات الأخيرة، ومع السعودية على المستوى الإقليمي، وحتى في الداخل العراقي عند ظهور اتجاهات مناوئة لطهران وهي عديدة.
الفارق بين الولايات المتحدة وإيران في العراق أن الأولى صنعت نفوذا مباشرا في هيكل النظام عبر حضورها السياسي والعسكري المباشر، ولأنها الحاكم الفعلي للعراق ما بعد صدام، وهو ما سمح لها بالتغلغل أكثر في البيروقراطية العراقية وفي مؤسسات الحكم وأعطاها اليد العليا في عملية صناعة القرار.
لكن الثغرة التي كانت تواجه واشنطن ولا تزال في هذا الجانب، أنها كانت دوما في علاقتها مع حلفائها العراقيين تتعامل من خلف جدار عال من عدم الثقة، وهو ما لم يسمح بتطوير التأثير ليصبح عضويا أكثر، ولعل ذلك يعود أيضا إلى واقع العلاقة بين الأجنبي القادم من خلف البحار وابن البلاد، وغياب القواسم المشتركة، غير المصالح، كالدين أو المذهب أو اللغة أو العرق أو العشيرة.
في زيارته الأخيرة إلى العراق، عكس الرئيس الأمريكي دونالد ترامب هذه المسافة باختياره القدوم ليلا إلى قاعده عين الأسد العسكرية حيث تتمركز القوات الأميركية في هذا البلد. الزيارة السرية وطلب ترامب من رئيس الوزراء العراقي عادل عبد المهدي ملاقاته في القاعدة دفع بالأخير لرفض اللقاء والاستعاضة عنها باتصال هاتفي، وإن كان مكتب عبد المهدي خفف من وقع الرفض بالقول إن اللقاء ألغي بسبب خلافات طريقة تنظيمه.
وفي المقابل، أراد حسن روحاني في زيارته أن يقدّم صورة مختلفة، وبدا جليا أن الإيرانيين وضعوا صورة زيارة ترامب أمام أعينهم وعملوا على المقارنة معها، فجاء في الصباح وطلب أن يكون أول نشاط له زيارة الكاظمية حيث ضريحا الإمامين موسى الكاظم ومحمد الجواد، الإمامين السابع والتاسع لدى الشيعة الاثني عشرية، وبذلك بعث رسالة إيجابية إلى من يشتركون معه في المذهب في العراق بأن المشتركات أكبر من الخلافات.
ثم كان اللقاء مع الرئيس العراقي برهم صالح ورئيس الحكومة عادل عبد المهدي ورئيس مجلس النواب محمد الحلبوسي ومعظم القادة الحزبيين والعشائريين والدينيين.
في الشارع العراقي أراء متفاوتة بشأن واشنطن وطهران، فهما تتقاسمان سخطاً سنياً من قبل من يرى فيهما سببا للتهميش المستمر وارتداداته على غير صعيد، وآخر شيعياً بسبب الأوضاع الاقتصادية والاجتماعية المتردية، على قاعدة أنهما يتحملان مسؤولية الطبقة السياسية التي أوصلت البلاد إلى هذا الدرك.
ما تملكه طهران ولا تملكه واشنطن في العراق هو القدرة على صناعة واقع مختلف من خلال عنصرين رئيسيين، الجغرافيا والعلاقات الإنسانية.

Thursday, January 31, 2019

مصر: عقار "الاستروكس" المخدر يدفع الحكومة لتعديل القوانين

شددت الحكومة المصرية عقوبات جلب المخدرات وحيازتها وتعاطيها، وأضافت مواد مخدرة جديدة للقائمة التي يجرمها القانون.
وينص مشروع القانون، الذي وافق عليه مجلس الوزراء، على عقوبات تشمل الإعدام لجالبي المخدرات ومصدريها، والسجن المؤبد لحائزيها بغرض الاتجار، والسجن المشدد للمتعاطين، بالإضافة إلى غرامة مالية.
ويأتي مشروع تعديل القانون في إطار التصدي الحاسم لمشكلة انتشار المخدرات بجميع صورها، خاصة المستحدثة منها، والتي شكلت في الآونة الأخيرة ظاهرة خطيرة تلقي بظلالها الضارة على المجتمع المصري عامة، وعلى فئة الشباب خاصة، بحسب بيان لمجلس الوزراء المصري.
وتفيد أرقام صندوق مكافحة الإدمان التابع لمجلس الوزراء المصري بارتفاع نسبة متعاطي مخدر "الاستروكس" و"الفودو" لعام 2018 عن العام السابق، فضلًا عن انخفاض أعمار متعاطي مخدر الاستروكس، لتتراوح بين 15 إلى 20 عاما.
ويقول الدكتور إبراهيم عسكر، مدير عام البرامج الوقائية لصندوق علاج ومكافحة الإدمان، إن نسبة متعاطي "الاستروكس" و"الفودو" ارتفعت في عام 2018، فبلغت 4.5 في المئة، بينما يحتل مخدرا "البانجو" و"الحشيش" أكثر من 30 في المئة من نسبة رواد المراكز العلاجية التابعة للصندوق، وعبر الخط الساخن للصندوق.
لكنه يضيف أن التقرير الأخير للصندوق "أظهر ارتفاعا فى نسبة متعاطي الاستروكس والفودو ليبلغ 25 في المئة من إجمالي عدد المرضى، وهو ما أجبرنا على تعديل البرامج العلاجية لتواكب التغيير الجديد".
وقد دشن الصندوق "خطا ساخنا" لتلقي طلبات المواطنين وبلاغات الراغبين فى العلاج من الإدمان.
ويبلغ عدد المراكز العلاجية التابعة للصندوق نحو ‏22 مركز علاج فى أنحاء مصر، تردد عليها خلال العام الماضي أكثر من 100 ألف مريض. ويقدم الصندوق العلاج بالمجان.
يقول الدكتور عبد الرحمن حماد، أخصائي الأمراض النفسية والمدير السابق لوحدة الإدمان بمستشفى العباسية الحكومي، إن المواد المخدرة مثل "الاستروكس" و"الفودو" هي مواد مخدرة مصنعة، ظهرت فى البدء كشبيه للمخدرات الطبيعية، إلا أنها خرجت عن السيطرة بعدما تم التلاعب فى تركيباتها.
ويقول حماد في حديثه لبي بي سي إن هذه المواد لها مخاطر غير متوقعة، ويضيف "نحن نجهل تركيبة هذه المواد وبالتالي لا يمكننا توقع مخاطرها بالكامل. نحن نعرف جيدا مخاطر وتأثير المخدرات الطبيعية مثل الحشيش وغيره، ولكن المخدرات المصنعة لا نعرف على وجه الدقة ما يمكن أن تنطوي عليه من مخاطر".
ويستكمل حماد حديثه قائلا "يسبب تعاطي هذه المواد "جلطة" أو فشلا كلويا أو مشاكل في الكبد، بالإضافة إلى الأخطار النفسية مثل الهلاوس، والسلوك العدواني العنيف، وربما الاكتئاب. وقد يصل الأمر إلى سلوك انتحاري".
ويُعزي حماد زيادة متعاطي مخدري "الاستروكس" و"الفودو" على وجه الخصوص وانتشار هذه المواد بين فئة المراهقين إلى عدة أسباب، أبرزها تدني سعرها مقارنة بالمخدرات الطبيعية، وكذلك لأنها لا تظهر فى التحاليل الطبية في الغالب.
ويقول عسكر إن المخدرات المصنعة لم تكن مدرجة على جدول المخدرات التي تظهر في الفحوصات الطبية، إلا أن أغلب متعاطي المخدرات دائما ما يخلطون أنواعا مختلفة من المخدرات فتظهر في الفحوصات الطبية الأنواع المعروفة فقط، أو المدرجة على جدول المخدرات".
ويرى أن التعديلات القانونية المقترحة "عالجت هذه النقطة من خلال إضافة الأنواع الجديدة المصنعة".
عقوبات مضاعفة
وينص مشروع التعديل على أن يعاقب بالإعدام كل من جلب أو صدّر مواد مصنعة ذات أثر تخديري أو ضار بالعقل أو الجسد أو الحالة النفسية والعصبية.
كما يعاقب بالسجن المؤبد والغرامة التي لا تزيد على 500 ألف جنيه (28 ألف دولار أمريكي) كل من حاز هذه المواد بقصد الاتجار.
وتكون العقوبة هي السجن المشدد والغرامة التي لا تزيد على 200 ألف جنيه (11 ألف دولار أمريكي) إذا كانت الحيازة بقصد التعاطي.
كما نص التعديل على أن يعاقب بالسجن المشدد والغرامة التي لا تقل عن 200 ألف جنيه (11 ألف دولار أمريكي) كل من أدار مكاناً أو هيئة للغير لتعاطي المواد المصنعة أو سهل تقديمها للتعاطي.
ويتفق عسكر وحماد على أن التعديلات المقترحة ستساهم بشكل كبير فى خفض معدلات تعاطي المواد المخدرة المصنعة، خاصة وأن الصندوق ينظم حملات للتوعية والكشف عن تعاطي المخدرات، خاصة على الطرق السريعة.
ويشير عسكر إلى أن جهود الصندوق بالتعاون مع الوزارات المصرية ساهمت إلى حد كبير فى خفض تعاطي المخدرات، فتشير أرقام الصندوق إلى أن نسبة متعاطي المخدرات من سائقي سيارات النقل على الطرق السريعة انخفضت من 24 في المئة إلى 12 في المئة، ووصلت لدى سائقي الحافلات الدراسية إلى 2.3 في المئة.
وختم عسكر حديثه بالقول إن صندوق مكافحة الإدمان "يعمل حاليا على عدد من الحملات التوعوية بالتعاون مع المشاهير مثل لاعب الكرة المصري محمد صلاح المحترف في نادي ليفربول الإنجليزي".