Tuesday, November 6, 2018

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

बिहार में सांप्रदायिक हिंसा के मामलों में बड़ी संख्या में बीजेपी के साथ-साथ हिंदू संगठनों के कार्यकर्ता और नेता गिरफ़्तार किए गए. ग़ौर करने वाली बात ये है कि हिंदू संगठनों के नेताओं और कार्यकर्ताओं में पुलिस और प्रशासन से नाराज़गी है.
क्या ये नीतीश कुमार की सख़्ती और सांप्रदायिक हिंसा पर उनके रुख़ को दिखाती है. जानकार थोड़ा 'हाँ' और थोड़ा 'ना' कहते हैं.
नचिकेता नारायण कहते हैं, "बिहार के जिन इलाक़ों में हिंसा हो रही थी, वहाँ कार्रवाई से प्रशासन पीछे नहीं हटा. उस दौरान प्रशासन के हाथ नहीं बांधे गए थे. हिंसा के पैटर्न को नीतीश कुमार ने डिकोड तो कर लिया है, लेकिन वो दाँव खेल रहे हैं कि देखते हैं कहाँ तक चलता है."
शायद यही वजह है कि नीतीश इस मुद्दे पर बीजेपी का कभी खुलकर विरोध नहीं करते. गिरिराज सिंह जब हिंसा भड़काने के अभियुक्तों से जेल में जाकर मिले, तो नीतीश ने दबी आवाज़ में एतराज़ जताया. जब अश्विनी चौबे के बेटे पुलिस और प्रशासन से लुका-छिपा का खेल खेल रहे थे, उस समय भी नीतीश की आवाज़ धीमी ही थी.किन उनकी पार्टी जनता दल (यूनाइटेड) का कहना है कि सांप्रदायिकता के मुद्दे पर उनकी पार्टी कभी समझौता नहीं करती.
पार्टी प्रवक्ता अजय आलोक कहते हैं, "सांप्रदायिक तनाव बढ़ाने की कोशिश की गई है जिसे हमने कंट्रोल कर लिया. इसलिए इस बार दशहरे के मौक़े पर हम ख़ुद एक्स्ट्रा सजग थे. ख़ुद मुख्यमंत्री मॉनिटर कर रहे थे. मुसलमान ये कह रहे हैं कि हम उनके ख़िलाफ़ हैं क्योंकि हम बीजेपी से मिलकर सरकार चला रहे हैं और हिंदू संगठन ये कह रहे हैं कि हम उनके ख़िलाफ़ हैं. नीतीश कुमार वही काम कर रहे हैं जो राज्य के लिए ठीक है."
लेकिन रोसड़ा की मस्जिद के बाहर मिले इरशाद आलम नीतीश कुमार के रुख़ से काफ़ी नाराज़ हैं. वे कहते हैं, "प्रशासन अगर ठीक रहता तो दंगा नहीं होता. नीतीश कुमार मुसलमानों को इसलिए भरोसा दिला रहे हैं क्योंकि उन्हें मुसलमानों का वोट चाहिए. जब बिहार में 17-18 जगह दंगे हुए, तो नीतीश कुमार का एक भी स्टेटमेंट नहीं आया. वो तो मान ही नहीं रहे थे कि दंगा हुआ."
इरशाद आलम की बात इसलिए भी सच लगती है क्योंकि जनता दल (यू) के प्रवक्ता अजय आलोक ने ये मानने से इनकार किया कि बिहार में सांप्रदायिक हिंसा हुई है, वो ये कहते हैं कि सिर्फ़ सांप्रदायिक तनाव था जिसे क़ाबू में कर लिया गया.
बिहार बीजेपी के अध्यक्ष नित्यानंद राय कहते हैं, "धर्म और आस्था व्यक्तिगत होती है, वो पार्टी आधारित नहीं होती है. भारतीय जनता पार्टी के किसी नेता का इसमें कोई हाथ नहीं है. मामला न्यायालय में है. दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा."
जानकार भी मानते हैं कि बदली परिस्थितियों में चूँकि पार्टी सरकार में है, इसलिए वो खुलकर सामने नहीं आएगी और उसका काम बजरंग दल, विश्व हिंदू परिषद जैसे संगठन करते रहेंगे.
पीटीआई के ब्यूरो चीफ़ नचिकेता नारायण कहते हैं, "भाजपा अपने हिंदूवादी एजेंडे को फैलाने के लिए ऐसा कुछ नहीं करेगी जिससे सरकार की बदनामी हो. तलवार मारने के लिए नहीं, डराने और तनाव फैलाने के लिए है. धार्मिक जुलूस की आड़ में उत्तेजक नारे लगाए जाते हैं ताकि दूसरा समुदाय डर जाए."
उनका कहना है कि भारत में अब सांप्रदायिक राजनीति तनाव फैलाने तक ही सीमित रहेगी. ये बड़े पैमाने पर हिंसा तक नहीं जाएगी, क्योंकि उसके बिना काम चल जाता है और सरकार पर नाकामी के आरोप नहीं लगते.
सामाजिक कार्यकर्ता उदय का भी यही मानना है. वे कहते हैं, "ये लोग बड़ा दंगा नहीं चाहते हैं, वे चाहते हैं कि छोटी-छोटी घटनाएँ हों, टेंशन हो और टेंशन को भी सामाजिक आधार दिया जाए. ये लोगों को ग़ुस्सा दिलाते हैं, नफ़रत पैदा करते हैं."
इस पूरे घटनाक्रम में एक और चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है और वो है हिंसा में दलितों और पिछड़ों की भागीदारी. ये तथ्य भागलपुर में देखने को मिला, जहाँ बड़ी संख्या में इस समुदाय के लोगों की गिरफ़्तारी हुई थी. दरअसल, आरएसएस दलितों और पिछड़ों में बड़ा अभियान चलाता रहा है.
भागलपुर में आरएसएस के नेता सुबोध विश्वकर्मा कहते हैं, "दलितों के बीच संस्कार भारती काम करती है. हम उन्हें बताते हैं कि ब्राह्मणों का विरोध मत करो, ख़ुद ब्राह्मण बन जाओ. वैसे भी बिहार में जब भी दंगे होते हैं, कटते-मरते तो अनुसूचित जनजाति, जाति और बैकवर्ड के ही लोग हैं."
सामाजिक कार्यकर्ता उदय उनकी बात को आगे बढ़ाते हैं. वे बताते हैं, "दलित और पिछड़े को समाज में नेतृत्व करने का मौक़ा नहीं मिला. तो दंगे में ही सही, उन्हें नेतृत्व सौंपा जा रहा है, उनके नेतृत्व को क़बूल किया जा रहा है. उनको लगता है कि उनकी लीडरशिप में ये कार्रवाई हो रही है. जिनको नेतृत्व करने का स्पेस नहीं मिला, वो दंगे में आगे आ जा रहे हैं. भागलपुर में 1989 में भी हुआ था और इस साल रामनवमी में भी ऐसा हुआ है."
बिहार में कुछ-कुछ महीनों के अंतराल पर होती सांप्रदायिक हिंसा और पर्व-त्यौहार के मौक़े पर बढ़ते तनाव चिंता का विषय हैं. आशंका यही है कि लोकतंत्र के सबसे बड़े पर्व में उन्माद भड़काने की कोशिश हो सकती है क्योंकि सांप्रदायिकता की आग से सियासी कड़ाही गर्म होगी.

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